Monday, 11 August 2014

अँधेरा

चारों तरफ घना अँधेरा था
सन्नाटे को चीरती एक खामोशी फैली थी उस कमरे में 
कुछ दिख नही रहा था 
मगर महसूस किया जा सकता था

एक कोने में बैठा वो सोच रहा था
के अब करे तो क्या करे
कैसे इस कमरे से बाहर निकले
कैसे इस कमरे को रौशनी से भरे

कुछ सूझता नही था उसे
फिर सोचा के दरवाज़ा खोल दे
तो शायद अँधेरा दूर हो जायेगा

दरवाज़ा खोलते ही
और गहरे अँधेरे ने कमरे को घेर लिया
किसी और का दिखना तो दूर
खुद को देखना भी मुश्किल हो गया

बहुत अकेला सा महसूस कर रहा था वो
फिर भी एक रौशनी की तलाश में
वो डरता, काँपता आगे बढ़ने लगा

लेकिन हर अगला कदम से
उसे और गहरा अँधेरा महसूस हो रहा था
जैसे के फिर इस बार उस ने
गलत रास्ता चुन लिया हो

एक डर लिए दिल में वो बढ़ा जा रहा है
लेकिन जाने कितने अंधेरों में
और वो खोया जा रहा है

कभी लगता के
शायद अब रौशनी करीब है
लेकिन वो और अँधेरे में
तब्दील होती गयी

हर कदम पे
और गहराता अँधेरा था
हर कदम पे वो खुद को
खुद से थोड़ा और खोता गया

Monday, 16 June 2014

Fir wahi samandar tha..

Fir wahi samandar tha,
Magar mai khud ko kuch badla hua sa mehsus kar rahi thi..

Wahi lehrein thi,
Samandar mei bhi aur mujhmei bhi fir bhi kuch anjaan si mujhko lag rahi thi..


Ankhon ki nami kuch us badlaav ke liye thi,
Kuch wo jo pal beet gaya sada ke liye uske liye thi..

Wo pal jo laut ke ab kabhi nhi aa payenge,
Wo pal jo tere kareeb baith ke maine yun hi ganva diye the ab sirf humko rulayenge..

Mai yunhi dekh rahi thi oonchi oonchi uthti lehron ko,
Aur soch rahi thi ke baha le jaye mujhe aur meri khaamoshi ko..

Meri aakhiri khwaish bass itni si hai 'Meen'...
Marne ke bad mujhe jalana nhi bs baha dena isi samandar mei...




Sunday, 8 June 2014

501 वाली मैडम!!

पहले जब मैं छोटी थी
तब सरकारी कॉलोनी में रहती थी
कॉलोनी के सब लोग जानते थे..
के ए ब्लाक 22 नंबर के घर में रहती हूँ मैं
वो जोशी जी की लड़की है

तब लगता था के कोई शैतानी कर दी
तो आ जायेंगे सब घर पर शिकायत ले के
सोचती थी क्यों ऐसी जगह रहती हूँ
जहाँ सब जानते हैं मुझे
हुह!! ठीक से मस्ती भी नहीं कर सकती

और अब जहाँ रहती हूँ ..

पाँचवे माले पे चार फ्लैट हैं
मगर पता नहीं मुझे के कौन हैं
नाम पता हैं नाम प्लेट्स पे पढ़ा है
मगर जानती किसी को नहीं हूँ
कभी बीमार भी पड़ती हूँ तो किसी को बुला भी नही सकती
शायद कोई आएगा भी नहीं
कोई जानता ही नही
तब दूर रहने वाली एक दोस्त को बुला लेती हूँ

अब सोचती हूँ,
शायद इसीलिए पापा सरकारी कॉलोनी में रहते थे
कम से कम लोग मदद के लिए तो खड़े रहते थे
मम्मी जब बीमार होती थी
तो बगल वाली आंटी रात भर उनके बगल में बैठी रहती थीं
और दीदी हम लोगों के पास
छोटे ही तो थे हम तीनों

अब तो बस लोग मुझे फ्लैट नंबर से जानते हैं

आप 501 वाली मैडम हैं न!!

Wednesday, 4 June 2014

दरवाज़ा

वो दरवाज़ा हमेशा खुला रहता था,
कभी बंद नहीं करते थे वो लोग,
उन्हें शायद किसी चीज़ के खोने का डर ही नहीं था..
या शायद कुछ था ही नहीं उस घर में चोरी करने लायक
ना सामान,
ना जवाहरात,
ना रिश्ते,
ना संवेदनाएं !!!

Saturday, 24 May 2014

Faisla thik tha..

Ek chhota sa kaam kaha tha usko ik roz
Aur usne hans kar taal diya tha
Fir jab naaraz ho kar maine baat karna band kar diya tha
To maafi to maang li thi lekin kaam fir bhi nhi kiya

Kaam aisa nhi tha ke karna hi pade
Lekin, zaruri tha mere liye
Uske liye
Usko zindagi mei aage badhne ke liye

Fir kuch mahinon baad maine fir jab usko yaad dilaya
Fir bhi usne taal diya
Maine fir se naraz hoke bola 'mohabbat nhi hai na tumko mujhse jo itni si baat nhi maante'
Usne fir maafi maangi
Lekin baat aayi gayi hi reh gayi..

Aaj achanak itne saalon ke baad kuch dekha maine..

Mera wohi kaam... aaj kar diya usne

Nhi, koi ghum nhi mujhe
Kisi aur ke kehne pe kiya hoga
Ya khud se hi kiya hoga
Ya aaj sahi samay aa gaya hoga uska
Shayad zindagi mei ruka hua sa kuch chal pada hoga
Mai khush hu uske liye...
Magar aaj aisa laga mujhe

Shayad, alag hone ka faisla thik tha..

Friday, 9 May 2014

शब्दों का एक रिश्ता

आज आखिरी दिन था उसका इस शहर मे.
जब आई थी वो यहाँ तो सोचा नही था के कुछ ऐसा भी हो सकता है जिससे उसे प्यार हो जायेगा इस शहर से। 

लेकिन वो कहते हैं ना के जो किस्मत में लिखा हो वो हो ही जाता है चाहे जितना भाग लो उस से. ट्रेन का टिकट हाथ में था लेकिन अभी भी वो चाह रही थी के उसे कोई रोक ले.... कोई नही 'वो' रोक ले उसे..... एक बार तो बोले के रुक जा, तू ऐसे नही जा सकती सब छोड़ के. 
लेकिन नही आया कोई. न वो खुद आया, न फ़ोन न मैसेज

दोनों के बीच यूँ तो कोई ख़ास रिश्ता भी नही था, मगर कुछ तो था जो दर्द दे रहा था उसे दिल में..वो ख़ामोशी उसकी आधी जान तो ले ही चुकी थी.. अब ये दूरी शायद खत्म ही कर देगी उनके एहसासों को. हाँ... एहसासों को, क्योंकि रिश्ता तो कोई बना ही नही ।।

और फिर सोचने लगी वो उस पल को जब उस से पहली बार बात हुयी थी.. वो अजनबी सा लगा ही नही था उसे.. यूँ लगा के कोई ऐसा है जो उसके मन की बात को आसानी से शब्दों में बयां कर देता है.

एक मिसरा फिर दूसरा … एक शेर फिर दूसरा 
रास्ता ख़त्म हुआ था लेकिन एक सिलसिला बस शुरू सा हुआ था ।। 
हिचकिचाहट भी थी मन में लेकिन सब कुछ बहुत अच्छा सा लग रहा था.… उसने पहले कभी  ऐसा महसूस नही किया था. ये एहसास उसके लिए कुछ नया सा ही तो था। 

और फिर बातों और शब्दों का एक ऐसा खेल शुरू हुआ जिसको वो दोनों बस खेलते ही जा रहे थे.. ना हार की चिंता न जीत का जोश.. बस खेल था एक.. और दोनों खेल रहे थे 
शब्दों से आगे बात आवाज़ तक पहुंची। … दोनों के एहसासों को एक नयी पहचान सी मिली और फिर आवाज़ से बात मुलाक़ात तक गयी.. घंटों तक बैठे थे दोनों एक दूसरे के सामने … दो कॉफ़ी मग थे और ढेर सारी बातें… उसकी आवाज़ की संजीदगी इसके दिल में अपनी जगह बना चुकी थी.. 

एक मुलाक़ात, फिर दूसरी और फिर तीसरी … एक दूसरे का हाथ पकड़े एक सूनसान सी सड़क पर दोनों चल रहे थे... पहली बार उसको एहसास हुआ था कि किसी के साथ चलना कितना अच्छा लगता है… 

लेकिन फिर ना वक़्त ने साथ दिया ना शब्दों ने। । 
वो हाथ जो उस रात छूट के अपने अपने घर को गए वो कभी फिर साथ नहीं आ पाये… वो एक आखिरी मुलाक़ात को भी तैयार नही हुआ… 

कई बार कोशिश की उसने, लेकिन…… 

और आज का दिन आ गया… जब वो सारी मुलाक़ातें, सारे शब्दों, वो कॉफ़ी, वो हाथ, वो साथ और वो एहसास सब छोड़ के जा रही थी… 

लेकिन एक विश्वास तो है उसे के सब कुछ भले ही खत्म हो गया हो लेकिन एक रिश्ता जो शब्दों का था उनके बीच वो कभी खत्म नही होगा 
उन शब्दों को वो अर्से बाद भी पहचान लेगा अगर जो उसके लिए लिखे जायेंगे...

Wednesday, 5 March 2014

अजनबी

कुछ बेचैनी थी साँसों में और आँखों में नमी भी थी
ना सुकून दिनों में था और ना रातों को नींद ही थी

सज़ा किसको क्या दी थी मैं खुद भी नहीं जानती थी
अपनी खुशियाँ लुटा के न जाने किसने  किसको खुशियाँ दी थी

एक एहसास है सीने में दबा ना ज़ाहिर हुआ  न भुला ही पायी थी
खुद से लड़ते झगड़ते न जाने हमने खुद को ही क्या बददुआ दी थी

न इंतज़ार रहा कभी किसी का न एहतराम था किसी से हमको
क्यों कर के हालत बिगड़े थे खुद से ही क्यों मैं अजनबी हुयी थी